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चंद्रकांता 1.16

बयान - 16

एक दिन तेजसिंह बालादवी के लिए विजयगढ़ के बाहर निकले। पहर दिन बाकी था जब घूमते-फिरते बहुत दूर निकल गए। देखा कि एक पेड़ के नीचे कुँवर वीरेंद्रसिंह बैठे हैं। उनकी सवारी का घोड़ा पेड़ से बँधा हुआ है, सामने एक बारहसिंघा मरा पड़ा है, उसके एक तरफ आग सुलग रही है, और पास जाने पर देखा कि कुमार के सामने पत्तों पर कुछ टुकड़े गोश्त के भी पड़े हैं।

तेजसिंह को देख कर कुमार ने जोर से कहा - ‘आओ भाई तेजिसिंह, तुम तो विजयगढ़ ऐसा गए कि फिर खबर भी न ली, क्या हमको एक दम ही भूल गए?’

तेजसिंह - (हँस कर) ‘विजयगढ़ में मैं आप ही का काम कर रहा हूँ कि अपने बाप का?’

वीरेंद्रसिंह – ‘अपने बाप का।’

यह कह कर हँस पड़े। तेजसिंह ने इस बात का कुछ भी जवाब न दिया और हँसते हुए पास जा बैठे। कुमार ने पूछा - ‘कहो चंद्रकांता से मुलाकात हुई थी?’

तेजसिंह ने जवाब दिया - ‘इधर जब से मैं गया हूँ इसी बीच में एक ऐयार को पकड़ा था। महाराज ने उसको कैद करने का हुक्म दिया मगर कैदखाने तक पहुँचने न पाया था कि रास्ते ही में मेरी सूरत बना उसके साथी ऐयारों ने उसे छुड़ा लिया, फिर अभी तक कोई गिरफ्तार न हुआ।’

कुमार – ‘वे लोग भी बड़े शैतान हैं।’

तेजसिंह – ‘और तो जो हैं, बद्रीनाथ भी चुनारगढ़ से इन लोगों के साथ आया है, वह बड़ा भारी चालाक है। मुझको अगर खौफ रहता है तो उसी का। खैर, देखा जाएगा, क्या हर्ज है। यह तो बताइए, आप यहाँ क्या कर रहे हैं? कोई आदमी भी साथ नहीं है।

कुमार - ‘आज मैं कई आदमियों को लेकर सवेरे ही शिकार खेलने के लिए निकला, दोपहर तक तो हैरान रहा, कुछ हाथ न लगा, आखिर को यह बारहसिंघा सामने से निकला और मैंने उसके पीछे घोड़ा फेंका। इसने मुझको बहुत हैरान किया, संग के सब साथी छूट गए, अब इस समय तीर खा कर गिरा है। मुझको भूख बड़ी जोर की लगी थी इससे जी में आया कि कुछ गोश्त भून के खाऊँ। इसी फिक्र में बैठा था कि सामने से तुम दिखाई पड़े, अब लो तुम ही इसको भूनो। मेरे पास कुछ मसाला था उसको मैंने धो-धाकर इन टुकड़ों में लगा दिया है, अब तैयार करो, तुम भी खाओ मैं भी खाऊँ, मगर जल्दी करो, आज दिन भर से कुछ नहीं खाया।’

तेजसिंह ने बहुत जल्द गोश्त तैयार किया और एक सोते के किनारे जहाँ साफ पानी निकल रहा था बैठ कर दोनों खाने लगे। वीरेंद्रसिंह मसाला पोंछ-पोछ कर खाते थे, तेजसिंह ने पूछा - ‘आप मसाला क्यों पोंछ रहे हैं?’

कुमार ने जवाब दिया - ‘फीका अच्छा मालूम होता है।’

दो-तीन टुकड़े खा कर वीरेंद्रसिंह ने सोते में से चुल्लू-भर के खूब पानी पिया और कहा - ‘बस भाई, मेरी तबीयत भर गई, दिन भर भूखे रहने पर कुछ खाया नहीं जाता।’

तेजसिंह ने कहा - ‘आप खाइए चाहे न खाइए मैं तो छोड़ता नहीं, बड़े मजे का बन पड़ा है।’ आखिर जहाँ तक बन पड़ा खूब खाया और तब हाथ-मुँह धो कर बोले – ‘चलिए, अब आपको नौगढ़ पहुँचा कर फिर फिरेंगे।’

वीरेंद्रसिंह ‘चलो’ कह कर घोड़े पर सवार हुए और तेजसिंह पैदल साथ चले।

थोड़ी दूर जा कर तेजसिंह बोले - ‘न मालूम क्यों मेरा सिर घूमता है।’

कुमार ने कहा - ‘तुम मांस ज्यादा खा गए हो, उसने गर्मी की है।’ थोड़ी दूर गए थे कि तेजसिंह चक्कर खा कर जमीन पर गिर पड़े। वीरेंद्रसिंह ने झट घोड़े पर से कूद कर उनके हाथ-पैर खूब कसके गठरी में बाँध पीठ पर लाद लिया और घोड़े की बाग थाम विजयगढ़ का रास्ता लिया। थोड़ी दूर जा कर जोर से जफील (सीटी) बजाई जिसकी आवाज जंगल में दूर-दूर तक गूँज गई। थोड़ी देर में क्रूरसिंह, पन्नालाल, रामनारायण और ज्योतिषी जी आ पहुँचे। पन्नालाल ने खुश हो कर कहा - ‘वाह जी बद्रीनाथ, तुमने तो बड़ा भारी काम किया। बड़े जबर्दस्त को फाँसा। अब क्या है, ले लिया।।’

क्रूरसिंह मारे खुशी के उछल पड़ा। बद्रनीथ ने, जो अभी तक कुँवर वीरेंद्रसिंह बना हुआ था, गठरी पीठ से उतार कर जमीन पर रख दी और रामनारायण से कहा - ‘तुम इस घोड़े को नौगढ़ पहुँचा दो, जिस अस्तबल से चुरा लाए थे उसी के पास छोड़ आओ, आप ही लोग बाँध लेंगे।’ यह सुन कर रामनारायण घोड़े पर सवार हो कर नौगढ़ चला गया। बद्रीनाथ ने तेजसिंह की गठरी अपनी पीठ पर लादी और ऐयारों को कुछ समझा-बुझा कर चुनारगढ़ का रास्ता लिया।

तेजसिंह को मामूल था कि रोज महाराज जयसिंह के दरबार में जाते और सलाम करके कुर्सी पर बैठ जाते। दो-एक दिन महाराज ने तेजसिंह की कुर्सी खाली देखी, हरदयालसिंह से पूछा कि - ‘आजकल तेजसिंह नजर नहीं आते, क्या तुमसे मुलाकात हुई थी?’

दीवान साहब ने अर्ज किया - ‘नहीं, मुझसे भी मुलाकात नहीं हुई, आज दरियाफ्त करके अर्ज करूँगा।’ दरबार बर्खास्त होने के बाद दीवान साहब तेजसिंह के डेरे पर गए, मुलाकात ने होने पर नौकरों से दरियाफ्त किया। सभी ने कहा - ‘कई दिन से वे यहाँ नहीं है, हम लोगों ने बहुत खोज की मगर पता न लगा।’

दीवान हरदयालसिंह यह सुन कर हैरान रह गए। अपने मकान पर जा कर सोचने लगे कि अब क्या किया जाए? अगर तेजसिंह का पता न लगेगा तो बड़ी बदनामी होगी, जहाँ से हो, खोज लगाना चाहिए। आखिर बहुत से आदमियों को इधर-उधर पता लगाने के लिए रवाना किया और अपनी तरफ से एक चिट्ठी नौगढ़ के दीवान जीतसिंह के पास भेज कर ले जाने वाले को ताकीद कर दी कि कल दरबार से पहले इसका जवाब ले कर आना। वह आदमी खत लिए शाम को नौगढ़ को पहुँचा और दीवान जीतसिंह के मकान पर जा कर अपने आने की इत्तिला करवाई। दीवान साहब ने अपने सामने बुला कर हाल पूछा, उसने सलाम करके खत दिया। दीवान साहब ने गौर से खत को पढ़ा, दिल में यकीन हो गया कि तेजसिंह जरूर ऐयारों के हाथ पकड़ा गया। यह जवाब लिख कर कि वह यहाँ नहीं है, आदमी को विदा कर दिया और अपने कई जासूसों को बुला कर पता लगाने के लिए इधर-उधर रवाना किया। दूसरे दिन दरबार में दीवान जीतसिंह ने राजा सुरेंद्रसिंह से अर्ज किया - ‘महाराज, कल विजयगढ़ से दीवान हरदयालसिंह का पत्र ले कर एक आदमी आया था, यह दरियाफ्त किया था, कि तेजसिंह नौगढ़ में है कि नहीं, क्योंकि कई दिनों से वह विजयगढ़ में नहीं है। मैंने जवाब में लिख दिया है कि यहाँ नहीं हैं।’

राजा को यह सुन कर ताज्जुब हुआ और दीवान से पूछा - ‘तेजसिंह वहाँ भी नहीं हैं और यहाँ भी नहीं तो कहाँ चला गया? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि ऐयारों के हाथ पड़ गया हो, क्योंकि महाराज शिवदत्त के कई ऐयार विजयगढ़ में पहुँचे हुए हैं और उनसे मुलाकात करने के लिए अकेला तेजसिंह गया था।’

दीवान साहब ने कहा - ‘जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह ऐयारों के हाथ में गिरफ्तार हो गया होगा, खैर, जो कुछ होगा दो-चार दिन में मालूम हो जाएगा।’

कुँवर वीरेंद्रसिंह भी दरबार में राजा के दाहिनी तरफ कुर्सी पर बैठे यह बात सुन रहे थे। उन्होंने अर्ज किया - ‘अगर हुक्म हो तो मैं तेजसिंह का पता लगाने जाऊँ?’

दीवान जीतसिंह ने यह सुन कर कुमार की तरफ देखा और हँस कर जवाब दिया - ‘आपकी हिम्मत और जवाँमर्दी में कोई शक नहीं, मगर इस बात को सोचना चाहिए कि तेजसिंह के वास्ते, जिसका काम ऐयारी ही है और ऐयारों के हाथ फँस गया है, आप हैरान हो जाएँ इसकी क्या जरूरत है? यह तो आप जानते ही हैं कि अगर किसी ऐयार को कोई ऐयार पकड़ता है तो सिवाय कैद रखने के जान से नहीं मारता, अगर तेजसिंह उन लोगों के हाथ में पड़ गया है तो कैद होगा, किसी तरह छूट ही जाएगा क्योंकि वह अपने फन में बड़ा होशियार है, सिवाय इसके जो ऐयारी का काम करेगा चाहे वह कितना ही चालाक क्यों न हो, कभी-न-कभी फँस ही जाएगा, फिर इसके लिए सोचना क्या? दस-पाँच दिन सब्र कीजिए, देखिए क्या होता है? इस बीच में, अगर वह न आया तो आपको जो कुछ करना हो कीजिएगा।’

वीरेंद्रसिंह ने जवाब दिया - ‘हाँ, आपका कहना ठीक है मगर पता लगाना जरूरी है। यह सोच कर कि वह चालाक है, छूट आएगा-खोज न करना मुनासिब नहीं।’

जीतसिंह ने कहा - ‘सच है, आपको मुहब्बत के सबब से उसका ज्यादा ख्याल है, खैर, देखा जाएगा।’

यह सुन राजा सुरेंद्रसिंह ने कहा - ‘और कुछ नहीं तो किसी को पता लगाने के लिए भेज दो।’

इसके जवाब में दीवान साहब ने कहा - ‘कई जासूसों का पता लगाने के लिए भेज चुका हूँ।’ राजा और कुँवर वीरेंद्रसिंह चुप रहे मगर ख्याल इस बात का किसी के दिल से न गया।

विजयगढ़ में दूसरे दिन दरबार में जयसिंह ने फिर हरदयालसिंह से पूछा - ‘कहीं तेजसिंह का पता लगा?’

दीवान साहब ने कहा - ‘यहाँ तो तेजसिंह का पता नहीं लगता, शायद नौगढ़ में हों। मैंने वहाँ भी आदमी भेजा है, अब आता ही होगा, जो कुछ है मालूम हो जाएगा।’

ये बातें हो रही थीं कि खत का जवाब लिए वह आदमी आ पहुँचा जो नौगढ़ गया था। हरदयालसिंह ने जवाब पढ़ा और बड़े अफसोस के साथ महाराज से अर्ज किया कि नौगढ़ में भी तेजसिंह नहीं हैं, यह उनके बाप जीतसिंह के हाथ का खत मेरे खत के जवाब में आया है।

महाराज ने कहा - ‘उसका पता लगाने के लिए कुछ फिक्र की गई है या नहीं?’

हरदयालसिंह ने कहा - ‘हाँ, कई जासूस मैंने इधर-उधर भेजे हैं।’

महाराज को तेजसिंह का बहुत अफसोस रहा, दरबार बर्खास्त करके महल में चले गए। बात ही बात में महाराज ने तेजसिंह का जिक्र महारानी से किया और कहा - ‘किस्मत का फेर इसे ही कहते हैं। क्रूरसिंह ने तो हलचल मचा ही रखी थी, मदद के वास्ते एक तेजसिंह आया था सो कई दिन से उसका भी पता नहीं लगता, अब मुझे उसके लिए सुरेंद्रसिंह से शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। तेजसिंह का चाल-चलन, बात-चीत, इल्म और चालाकी पर जब ख्याल करता हूँ, तबीयत उमड़ आती है। बड़ा लायक लड़का है। उसके चेहरे पर उदासी तो कभी देखी ही नहीं।’

महारानी ने भी तेजसिंह के हाल पर बहुत अफसोस किया। इत्तिफाक से चपला उस वक्त वहीं खड़ी थी, यह हाल सुन वहाँ से चली और चंद्रकांता के पास पहुँची। तेजसिंह का हाल जब कहना चाहती थी, जी उमड़ आता है, कुछ कह न सकती थी। चंद्रकांता ने उसकी दशा देख पूछा - ‘क्यों? क्या है? इस वक्त तेरी अजब हालत हो रही है, कुछ मुँह से तो कह।’

इस बात का जवाब देने के लिए चपला ने मुँह खोला ही था कि गला भर आया, आँखों से आँसू टपक पड़े, कुछ जवाब न दे सकी। चंद्रकांता को और भी ताज्जुब हुआ, पूछा - ‘तू रोती क्यों है, कुछ बोल भी तो।’

आखिर चपला ने अपने को सँभाला और बहुत मुश्किल से कहा - ‘महाराज की जुबानी सुना है कि तेजसिंह को महाराज शिवदत्त के ऐयारों ने गिरफ्तार कर लिया। अब वीरेंद्रसिंह का आना भी मुश्किल होगा क्योंकि उनका वही एक बड़ा सहारा था।’ इतना कहा था कि पूरे तौर पर आँसू भर आए और खूब खुल कर रोने लगी। इसकी हालत से चंद्रकांता समझ गई कि चपला भी तेजसिंह को चाहती है, मगर सोचने लगी कि चलो अच्छा ही है इसमें भी हमारा ही भला है, मगर तेजसिंह के हाल और चपला की हालत पर बहुत अफसोस हुआ, फिर चपला से कहा - ‘उनको छुड़ाने की यही फिक्र हो रही है? क्या तेरे रोने से वे छूट जाएँगे? तुझसे कुछ नहीं हो सकता तो मैं ही कुछ करूँ?’

चंपा भी वहाँ बैठी यह अफसोस भरी बातें सुन रही थी, बोली - ‘अगर हुक्म हो तो मैं तेजसिंह की खोज में जाऊँ?’

चपला ने कहा - ‘अभी तू इस लायक नहीं हुई है?’

चंपा बोली - ‘क्यों, अब मेरे में क्या कसर है? क्या मैं ऐयारी नहीं कर सकती?’

चपला ने कहा - ‘हाँ, ऐयारी तो कर सकती है मगर उन लोगों का मुकाबला नहीं कर सकती जिन लोगों ने तेजसिंह जैसे चालाक ऐयार को पकड़ लिया है। हाँ, मुझको राजकुमारी हुक्म दें तो मैं खोज में जाऊँ?’

चंद्रकांता ने कहा - ‘इसमें भी हुक्म की जरूरत है? तेरी मेहनत से अगर वे छूटेंगे तो जन्म भर उनको कहने लायक रहेगी। अब तू जाने में देर मत कर, जा।’

चपला ने चंपा से कहा - ‘देख, मैं जाती हूँ, पर ऐयार लोग बहुत से आए हुए हैं, ऐसा न हो कि मेरे जाने के बाद कुछ नया बखेड़ा मचे। खैर, और तो जो होगा देखा जाएगा, तू राजकुमारी से होशियार रहियो। अगर तुझसे कुछ भूल हुई या राजकुमारी पर किसी तरह की आफत आई तो मैं जन्म-भर तेरा मुँह न देखूँगी।’

चंपा ने कहा - ‘इस बात से आप खातिर जमा रखें, मैं बराबर होशियार रहा करूँगी।’

चपला अपने ऐयारी के सामान से लैस हो और कुछ दक्षिणी ढंग के जेवर तथा कपड़े ले तेजसिंह की खोज में निकली।

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