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चंद्रकांता 1.7

बयान - 7

अहमद के पकड़े जाने से नाजिम बहुत उदास हो गया और क्रूरसिंह को तो अपनी ही फिक्र पड़ गई कि कहीं तेजसिंह मुझको भी न पकड़ ले जाए। इस खौफ से वह हरदम चौकन्ना रहता था, मगर महाराज जयसिंह के दरबार में रोज आता और वीरेंद्रसिंह के प्रति उनको भड़काया करता।

एक दिन नाजिम ने क्रूरसिंह को यह सलाह दी कि जिस तरह हो सके अपने बाप कुपथसिंह को मार डालो, उसके मरने के बाद जयसिंह जरूर तुमको मंत्री (वजीर) बनाएँगे, उस वक्त तुम्हारी हुकूमत हो जाने से सब काम बहुत जल्द होगा।

आखिर क्रूरसिंह ने जहर दिलवा कर अपने बाप को मरवा डाला। महाराज ने कुपथसिंह के मरने पर अफसोस किया और कई दिन तक दरबार में न आए। शहर में भी कुपथसिंह के मरने का गम छा गया।

क्रूरसिंह ने जाहिर में अपने बाप के मरने का भारी मातम (गम) किया और बारह रोज के वास्ते अलग बिस्तर जमाया। दिन भर तो अपने बाप को रोता पर रात को नाजिम के साथ बैठ कर चंद्रकांता से मिलने तथा तेजसिंह और वीरेंद्रसिंह को गिरफ्तार करने की फिक्र करता। इन्हीं दिनों वीरेंद्रसिंह ने भी शिकार के बहाने विजयगढ़ की सरहद पर खेमा डाल दिया था, जिसकी खबर नाजिम ने क्रूरसिंह को पहुँचाई और कहा – ‘वीरेंद्रसिंह जरूर चंद्रकांता की फिक्र में आया है, अफसोस। इस समय अहमद न हुआ नहीं तो बड़ा काम निकलता। खैर, देखा जाएगा।’ वह कह क्रूरसिंह से विदा हो बालादवी (टोह लेने के लिए गश्त करना) के वास्ते चला गया।

तेजसिंह वीरेंद्रसिंह से रुखसत हो विजयगढ़ पहुँचे और मंत्री के मरने तथा शहर भर में गम छाने का हाल ले कर वीरेंद्रसिंह के पास लौट आए। यह भी खबर लाए कि दो दिन बाद सूतक निकल जाने पर महाराज जयसिंह क्रूर को अपना दीवान बनाएँगे।

वीरेंद्रसिंह – ‘देखो, क्रूर ने अपने बाप को मार डाला। अगर राजा को भी मार डाले तो ऐसे आदमी का क्या ठिकाना।’

तेजसिंह – ‘सच है, वह नालायक जहाँ तक भी होगा राजा पर भी बहुत जल्द हाथ फेरेगा, अस्तु अब मैं दो दिन चंद्रकांता के महल में न जा कर दरबार ही का हाल-चाल लूँगा। हाँ, इस बीच में अगर मौका मिल जाए तो देखा जाएगा।’

वीरेंद्रसिंह – ‘सो सब कुछ नहीं, चाहे जो हो, आज मैं चंद्रकांता से जरूर मुलाकात करूँगा।’

तेजसिंह – ‘आप जल्दी न करें, जल्दी ही सब कामों को बिगाड़ती है।’

वीरेंद्र – ‘जो भी हो, मैं तो जरूर जाऊँगा।’

तेजसिंह ने बहुत समझाया मगर चंद्रकांता की जुदाई में उनको भला-बुरा क्या सूझता था, एक न मानी और चलने के लिए तैयार हो ही गए। आखिर तेजसिंह ने कहा - ‘खैर, नहीं मानते तो चलिए, जब आपकी ऐसी मर्जी है तो हम क्या करें। जो कुछ होगा देखा जाएगा।’

शाम के वक्त ये दोनों टहलने के लिए खेमे के बाहर निकले और अपने प्यादों से कह गए कि अगर हम लोगों के आने में देर हो तो घबराना मत। टहलते हुए दोनों विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए।

कुछ रात गई होगी, जब चंद्रकांता के उसी नजरबाग के पास पहुँचे जिसका हाल पहले लिख चुके हैं।

रात अँधेरी थी इसलिए इन दोनों को बाग में जाने के लिए कोई आश्चर्य न करना पड़ा, पहरे वालों को बचा कर कमंद फेंका और उसके जरिए बाग के अंदर एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो इधर-उधर निगाह दौड़ा कर देखने लगे।

बाग के बीचो-बीच संगमरमर के एक साफ चिकने चबूतरे पर मोमी शमादान जल रहा था चंद्रकांता, चपला और चंपा बैठी बातें कर रही थीं। चपला बातें भी करती जाती थी और इधर-उधर तेजी के साथ निगाह भी दौड़ा रही थी।

चंद्रकांता को देखते ही वीरेंद्रसिंह का अजब हाल हो गया, बदन में कँपकँपी होने लगी, यहाँ तक कि बेहोश हो कर गिर पड़े। मगर वीरेंद्रसिंह की यह हालत देख तेजसिंह पर कोई प्रभाव न हुआ, झट अपने ऐयारी बटुए से लखलखा निकाल सुँघा दिया और होश में ला कर कहा - ‘देखिए, दूसरे के मकान में आपको इस तरह बेसुध न होना चाहिए। अब आप अपने को सँभालिए और इसी जगह ठहरिए, मैं जा कर बात कर आऊँ तब आपको ले चलूँ।’ यह कह कर उन्हें उसी पेड़ के नीचे छोड़, उस जगह गए जहाँ चंद्रकांता, चपला और चंपा बैठी थीं।

तेजसिंह को देखते ही चंद्रकांता बोली - ‘क्यों जी इतने दिन कहाँ रहे? क्या इसी का नाम मुरव्वत है? अबकी आए तो अकेले ही आए। वाह, ऐसा ही था तो हाथ में चूड़ी पहन लेते, शर्मिंदा होकर की डींग क्यों मारते हैं। जब उनकी मुहब्बत का यही हाल है तो मैं जी कर क्या करूँगी?’ कह कर चंद्रकांता रोने लगी, यहाँ तक कि हिचकी बँध गई। तेजसिंह उसकी हालत देख बहुत घबराए और बोले - ‘बस, इसी को नादानी कहते हैं। अच्छी तरह हाल भी न पूछा और लगीं रोने, ऐसा ही है तो उनको लिए आता हूँ।’

यह कह कर तेजसिंह वहाँ गए जहाँ वीरेंद्रसिंह को छोड़ा था और उनको अपने साथ ले चंद्रकांता के पास लौटे। चंद्रकांता वीरेंद्रसिंह के मिलने से बड़ी खुश हुई, दोनों मिल कर खूब रोए, यहाँ तक कि बेहोश हो गए मगर थोड़ी देर बाद होश में आ गए और आपस में शिकायत मिली मुहब्बत की बात करने लगे।

अब जमाने का उलट-फेर देखिए। घूमता-फिरता टोह लगाता नाजिम भी उसी जगह आ पहुँचा और दूर से इन सभी की खुशी भरी मजलिस देख कर जल मरा। तुरंत ही लौट कर क्रूरसिंह के पास पहुँचा। क्रूरसिंह ने नाजिम को घबराया हुआ देखा और पूछा - ‘क्यों, क्या बात है जो तुम इतना घबराए हुए हो?’

नाजिम - है क्या, जो मैं सोचता था वही हुआ। यही वक्त चालाकी का है, अगर अब भी कुछ न बन पड़ा तो बस तुम्हारी किस्मत फूट गई, ऐसा ही समझना पड़ेगा।

क्रूरसिंह – ‘तुम्हारी बातें तो कुछ समझ में नहीं आतीं, खुलासा कहो, क्या बात है?’

नाजिम – ‘खुलासा बस यही है कि वीरेंद्रसिंह चंद्रकांता के पास पहुँच गया और इस समय बाग में हँसी के कहकहे उड़ रहे हैं।

यह सुनते ही क्रूरसिंह की आँखों के आगे अँधेरा छा गया, दुनिया उदास मालूम होने लगी, कहाँ तो बाप के जाहिरी गम में वह सर मुड़ाए बरसाती मेढक बना बैठा था, तेरह रोज कहीं बाहर जाना हो ही नहीं सकता था, मगर इस खबर ने उसको अपने आपे में न रहने दिया, फौरन उठ खड़ा हुआ और उसी तरह नंग-धड़ंग औंधी हाँडी-सा सिर लिए महाराज जयसिंह के पास पहुँचा। जयसिंह क्रूरसिंह को इस तरह आया देख हैरान हो बोले - ‘क्रूरसिंह, सूतक और बाप का गम छोड़ कर तुम्हारा इस तरह आना मुझको हैरानी में डाल रहा है।’

क्रूरसिंह ने कहा - ‘महाराज, हमारे बाप तो आप हैं, उन्होंने तो पैदा किया, परवरिश आप की बदौलत होती है। जब आपकी इज्जत में बट्टा लगा तो मेरी जिंदगी किस काम की है और मैं किस लायक गिना जाऊँगा?’

जयसिंह - (गुस्से में आ कर) ‘क्रूरसिंह। ऐसा कौन है जो हमारी इज्जत बिगाड़े?’

क्रूरसिंह – ‘एक अदना आदमी।‘

जयसिंह - (दाँत पीस कर) ‘जल्दी बताओ, वह कौन है, जिसके सिर पर मौत सवार हुई है?’

क्रूरसिंह – ‘वीरेंद्रसिंह।’

जयसिंह – ‘उसकी क्या मजाल जो मेरा मुकाबला करे, इज्जत बिगाड़ना तो दूर की बात है। तुम्हारी बात कुछ समझ में नहीं आती, साफ-साफ जल्द बताओ, क्या बात है? वीरेंद्रसिंह कहाँ हैं?’

क्रूरसिंह- ‘आपके चोर महल के बाग में।’

यह सुनते ही महाराज का बदन मारे गुस्से के काँपने लगा। तड़प कर हुक्म दिया – ‘अभी जा कर बाग को घेर लो, मै कोट की राह वहाँ जाता हूँ।’

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